गुरुवार, 23 जुलाई 2009

उधार से






गुनगुनाती गुई आती है फलक से बूंदें
फ़िर कोई बदली तेरी पाजेब से टकराई है.

















बारिश को देख रह नही गया तो कुछ लाइन उधर की ली कुछ तस्वीरें भी .....

छत टपकती है और घर में ' वो ' मेहमान है
पानी - पानी हो रही है आबरू बरसात में ।









10 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

bahut khoob chitra
bahut khoob she'r
_____________________badhaai !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेहतरीन चित्र और लाजवाब शेर...कमाल का तालमेल बिठाया है आपने...एक शेर झोंपडे वाले चित्र को देख कर:
इन बारिशों से दोस्ती अच्छी नहीं ,'फ़राज़'
कच्चा तेरा मकान है कुछ तो ख्याल कर

नीरज

Udan Tashtari ने कहा…

जबरदस्त तस्वीरें...उधार में ही सही, खूब सजा:

छत टपकती है और घर में ' वो ' मेहमान है
पानी - पानी हो रही है आबरू बरसात में ।

admin ने कहा…

SHAANDAAR.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Unknown ने कहा…

khubsurat chitra aur bhav

M VERMA ने कहा…

बहुत शानदार

Vinay ने कहा…

सुन्दर दर्शन

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सुंदर चित्र हैं बरखा रानी के.....और लाजवाब शेर.....

Himanshu Pandey ने कहा…

खूबसूरत चित्रों के खूबसूरत कैप्शन दिए हैं आपने शेर के माध्यम से । धन्यवाद ।

aarkay ने कहा…

बरसात का यह भी एक रूप है जो इन चित्रों में बयान होता है. इन्हें देख कर बरखा रानी से जम कर बरसने की गुजारिश नहीं की जा सकती ! सुंदर चित्र व केप्शन !