शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

श् श्श्.... बिना बोले नहाना है!





आज सूर्यग्रहण है यह तो सबको मालूम है पर कम ही लोगों को मालूम होगा कि आज मौनी अमावश्या भी है। मौनी अमावश्या
मतलब स्नान ध्यान का ऐसा त्योहार जिसमें स्नान के बाद ही कुछ बोलते हैं। बचपन में जब घर पर रहा करती थी तो रात को ही मम्मी याद दिला देती थीं कल मौनी अमावश्या है बिना कुछ बोले ही नहाना है। सुबह उठाते समय भी बार बार कहती- चुप रहना जब तक नहाओगी नहीं बोलना नहीं है। बेटा, कुछ मत बोलना चलो पहले नहा लो।
और अक्सर हम हिदायत भूल जाते। जनवरी की कड़कड़ाती सर्दी में सुबह - सुबह उठना और नहाना बड़ा मुश्किल लगता। हम सुबह उठ तो जाते पर हमेंशा ही बिना बोले नहाने का प्रण टूट जाता। कभी उठाने पर बोल पड़ते थोड़ा और सोना है। कभी नहाते समय चिल्लाते पानी ज्यादा गर्म है। कभी ठंड- ठंड ही बोल पड़ते। कभी हम भाई - बहनों की आपस में ही झड़प हो जाती। बिना बोले क्यों नहाते हैं पूछने पर कभी संतोष जनक उत्तर नहीं मिला। बस इतना ही जान सके कि सुबह जितनी जल्दी हो सके नहाना चाहिए। स्नान के बाद तिल तापना होता है(आग में तिल डालकर उसके धुएं की सेंक लेना।), हम ब्राह्मणों के लिए सीधा छूते(दान की वस्तु छूकर संकल्प लेते), िफर तिल खाकर ही कुछ बोलने की परंपरा होती। जब भी हम कुनमुनाते दादी कहती ,टीवी खोल कर देखो कितने लोगों ने सुबह चार बजे से ही गंगा स्नान कर लिया है। एक हमारे घर के बच्चे ही सोते रहे।
स्नान करने के बाद की प्रतिबद्धता तो उब भी है पर हम बिना बोले नहाना सीख गए हैं। वैसे आज में ऐसा नहीं कर पाई क्योंकि हमारे जीवन में मोबाइल का अनाधिकर प्रवेश हो चुका है। उठकर सबसे पहले किसी से बात ही करनी पड़ी।

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

संक्रांति की बधाई








आज मकर संक्रांति है। सूर्याेपासना का पर्व। सबने स्नान ध्यान के साथ नवान्न का bhog किया होगा। पतंग उड़ाई होगी। मैं आज पतंग के बारे में बताती हूं।

इतिहास
माना जाता है कि पतंग का आविष्कार ईसा पूर्व तीसरी सदी में चीन में हुआ था। दुनिया की पहली पतंग एक चीनी दार्शनिक मो दी ने बनाई थी। इस प्रकार पतंग का इतिहास लगभग 2,300 वर्ष पुराना है। पतंग बनाने का उपयुक्त सामान चीन में उप्लब्ध था जैसे:- रेशम का कपडा़, पतंग उडाने के लिये मबूत रेशम का धागा, और पतंग के आकार को सहारा देने वाला हल्का और मजबूत बाँस।

चीन के बाद पतंगों का फैलाव जापान, कोरिया, थाईलैंड, बर्मा, भारत, अरब, उत्तर अफ़्रीका तक हुआ।

संस्कृतियों में पतंग
हवा में डोलती अनियंत्रित डोर थामने वालों को आसमान की ऊंचाइयों तक ले जाने वाली पतंग अपने 2,000 वर्षों से अधिक पुराने इतिहास में अनेक मान्यताओं, अंधविश्वासों और अनूठे प्रयोगों का आधार भी रही है। अपने पंखों पर विजय और वर्चस्व की आशाओं का बोझ लेकर उड़ती पतंग ने अपने अलग-अलग रूपों में दुनिया को न केवल एक रोमांचक खेल का माध्यम दिया, बल्कि एक शौक के रूप में यह विश्व की विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में रच-बस गई।

पतंग भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में एक शौक का माध्यम बनने के साथ-साथ आशाओं, आकांक्षाओं और मान्यताओं को पंख भी देती है।
चीन
पतंग का अंधविश्वासों में भी विशेष स्थान है। चीन में किंन राजवंश के शासन के दौरान पतंग उड़ाकर उसे अज्ञात छोड़ देने को अपशकुन माना जाता था। साथ ही किसी की कटी पतंग को उठाना भी बुरे शकुन के रूप में देखा जाता था।
थाईलैंड
पतंग धार्मिक आस्थाओं के प्रदर्शन का माध्यम भी रह चुकी है। थाइलैंड में हर राजा की अपनी विशेष पतंग होती थी जिसे जाड़े के मौसम में भिक्षु और पुरोहित देश में शांति और खुशहाली की आशा में उड़ाते थे।

थाइलैंड के लोग भी अपनी प्रार्थनाओं को भगवान तक पहुंचाने के लिए वर्षा ऋतु में पतंग उड़ाते थे। दुनिया के कई देशों में ?? नवंबर को पतंग उडाओ दिवस (फ्लाई ए काइट डे) के रूप में मनाते हैं।

यूरोप

अमेरिका के लिंकन नगर का पतंगोत्सव।यूरोप में पतंग उड़ाने का चलन नाविक मार्को पोलो के आने के बाद आरंभ हुआ। माकोoपूर्व की यात्रा के दौरान प्राप्त हुए पतंग के कौशल को यूरोप में लाया। माना जाता है कि उसके बाद यूरोप के लोगों और िफर अमेरिका के निवासियों ने वैज्ञानिक और सैन्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पतंग का प्रयोग किया।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डाक्टर नीडहम ने अपनी चीनी विज्ञान एवँ प्रौद्योगिकी का इतिहास (ए हिस्ट्री आफ चाइनाज साइंस एण्ड टेक्नोलोजी) नामक पुस्तक में पतंग को चीन द्वारा यूरोप को दी गई एक प्रमुख वैज्ञानिक खोज बताया है। यह कहा जा सकता है कि पतंग को देखकर मन में उपजी उड़ने की लालसा ने ही मनुष्य को विमान का आविष्कार करने की प्रेरणा दी होगी।

भारत

दिल्ली में पतंगों की एक दुकान।पतंग उड़ाने का शौक चीन, कोरिया और थाइलैंड समेत दुनिया के कई अन्य भागों से होकर भारत में पहुंचा। देखते ही देखते यह शौक भारत में एक शगल बनकर यहां की संस्कृति और सभ्यता में रच-बस गया। खाली समय का साथी बनी पतंग को खुले आसमान में उड़ाने का शौक बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के सिर चढ़कर बोलने लगा। भारत में पतंगबाजी इतनी लोकप्रिय हुई कि कई कवियों ने इस साधारण सी हवा में उड़ती वस्तु पर भी कविताएँ लिख डालीं।
एक समय में मनोरंजन के प्रमुख साधनों में से एक, लेकिन समय के साथ-साथ पतंगबाजी का शौक भी अब कम होता जा रहा है। एक तो समय का अभाव और दूसरा खुले स्थानों की कमी जैसे कारणों के चलते इस कला का, जिसने कभी मनुष्य की आसमान छूने की महत्वकांक्षा को साकार किया था, अब इतिहास में सिमटने को तैयार है। अब तो केवल कुछ विशेष दिनों और पतंगोत्सवों में ही पतंगों के दर्शन हो पाते हैं।
पतंग उत्सव
राजस्थान में तो पर्यटन विभाग की ओर से प्रतिवर्ष तीन दिवसीय पतंगबाजी प्रतियोगिता होती है जिसमें जाने-माने पतंगबाज भाग लेते हैं। राज्य पर्यटन आयुक्त कार्यालय के सूत्रों के अनुसार राज्य में हर वर्ष मकर संका्रंति के दिन परंपरागत रूप से पतंगबाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमें राज्य के पूर्व दरबारी पतंगबाजों के परिवार के लोगों के साथ-साथ विदेशी पतंगबाज भी भाग लेते हैं।

इसके अतिरिक्त दिल्ली और लखनऊ में भी पतंगबाजी के प्रति आकर्षण है। दीपावली के अगले दिन जमघट के दौरान तो आसमान में पतंगों की कलाबाजियां देखते ही बनती हैं। दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भी पतंग उडो का चलन है।

यद्यपि आज के भागमभाग पूर्ण जीवन में खाली समय की कमी के कारण यह शौक कम होता जा रहा है, लेकिन यदि अतीत पर दृष्टि डालें तो हम पाएँगे कि इस साधारण सी पतंग का भी मानव सभ्यता के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान है।
मान्यताओं, परम्पराओं व अंधविश्वासो में पतंग
आसमान में उड़ने की मनुष्य की आकांक्षा को तुष्ट करने और डोर थामने वाले की उमंगों को उड़ान देने वाली पतंग दुनिया के विभिन्न भागों में अलग अलग मान्यताओं परम्पराओं तथा अंधविश्वास की वाहक भी रही है।

मानव की महत्वाकांक्षा को आसमान की ऊँचाईयों तक ले जाने वाली पतंग कहीं शगुन और अपशकुन से जुड़ी है तो कहीं ईश्वर तक अपना संदेश पहुंचाने के माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित है। प्राचीन दंतकथाओं पर विश्वास करें तो चीन और जापान में पतंगों का उपयोग सैन्य उद्देश्यों के लिये भी किया जाता था।

चीन में किंग राजवंश के शासन के दौरान उड़ती पतंग को यूं ही छोड़ देना दुर्भाग्य और बीमारी को न्यौता देने के समान माना जाता था। कोरिया में पतंग पर बच्चे का नाम और उसके जन्म की तिथि लिखकर उड़ाया जाता था ताकि उस वर्ष उस बच्चे से जुड़ा दुर्भाग्य पतंग के साथ ही उड़ जाए।

मान्यताओं के अनुसार थाईलैंड में बारिश के मौसम में लोग भगवान तक अपनी प्रार्थना पहुंचाने के लिये पतंग उड़ाते थे जबकि कटी पतंग को उठाना अपशकुन माना जाता था।
जानकारियां वीकीपीडिया से साभार।

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

पक्षी को बुलाना है



पक्षियों के लिए दाना- पानी रखने की बात अब कई लोग करने लगे हैं। बहुत सारे लोग गर्मी में कम से कम पानी तो रखते ही हैं। मेरे घर में दादी रोज सुबह ही छत पर चावल बिखेर आती थीं। हमारे उठने से पहले ही चिड़ियां आकर दाने चुग जाती थीं। अब जब से पत्रकारिता लाइन में आई हूं तब तो दो बजे के पहले सोना नहीं होता है। जाहिर से सुबह उठती भी हूं नौ के बाद ही। सो यहां जबलपुर में पक्षियों को चारा डालने की परंपरा नहीं आ सकी। एक दिन सोचा ऐसा करती हूं, रात को ही दाना डाल देती हूं, सुबह पक्षी आकर खा लेंगें। मैंने किया भी वहीं। पर आश्चर्य सुबह दाने ज्यों के त्याें पड़े थे। एक - एक की सात दिन हो गए पर दाना वैसे ही पड़ा रहा। तब मुझे समझ में आया यहां जबलपुर जैसे छोटे जगह से भी चिड़ियां रूठ चुकीं हैं। तब महानगरों की क्या स्थिति होगी? वहां के बच्चों ने तो कभी अपने आंगन में या बालकनी में, आजू- बाजू कहीं भी चिड़ियां देखा ही नहीं होगा। सुबह उनका चहचहाना भी नहीं सुना होगा। उसके बाद कई बार दाना रखा पर एक भी चिड़ियां नहीं बुला सकी। जाने कहां होगी, घर और आवास की जगह छिनने के बाद कितनी ही चिड़ियों का अस्तित्व खत्म होता जा रहा है। क्या उनको बचाने का कोई उपाय आप सबको दिखता है तो मुझे बताइयेगा। मैं चिड़ियों को वापस बुलाना चाहती हूं। नई पीढ़ी को उनकी तान सुनाना चाहती हूं।

सोमवार, 4 जनवरी 2010

नव वर्ष की बधाई





काफी दिनों से ब्लॉग से दूर रही मैं। रोज- लिखने में कोई ने कोई अड़चन आ रही थी तो बंद ही कर दिया। बहुत से लोगों ने इसके लिए टोका भी। नये साल में मैंने तय किया है। कुछ भी हो अब रेगुलर रहूंगी। कमेंट करना भी छोड़ दिया था मैंने। ब्लाग्स तो देखती थी पर कमेंट नहीं कर पाती थी। अब इसे भी रेगुलर कर रही हूं।


सभी ब्लॉगर साथियों को नये साल की बधाई।

बुधवार, 11 नवंबर 2009

कलम की एक सत्ता होती है- विष्णु नागर

22 अगस्त को जबलपुर आये विष्णु नागर जी से मैंने छोटी सी मुलाकात की थी।

जिनकी लेखनी में व्यंग्य का पैनापन हो और कलम आम आदमी की समस्या, पी़ड़ा से भीगी हो। जो लगभग 37 साल से सक्रिय पत्रकारिता से जु़ड़े हैं और साहित्य से जिनका पुराना रिश्ता है। जी हां main बात कर रहे हैं लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार विष्णु नागर की। विष्णु जी अभी नई दुनिया में एक्जक्यूटीव एडीटर होने के साथ ही साहित्य रचना में भी सक्रिय हैं। पेश है परसाई जी की जयंति पर जबलपुर आये नागर जी से बात चीत ...।

सक्रिय पत्रकारिता से जु़ड़े हैं। निरंतर लेखन करते रहे हैं। साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखन, चिंतन सबकुछ कैसे संभव हो पाता है?
नागर जी- यह इतना मुश्किल नहीं है। पत्रकारिता में रहते हुए अनुभवों का विस्तार होता है। अगर आप चिंतन - मनन के साथ रोज अखबार प़ढ़ें तो जीवन के हर क्षेत्र की जानकारी होगी। मेरी नजर में समाचार पत्र रोज छपने वाला महाभारत ही है। जीवन के हर पहलू दृष्टिगत होते हैं इसमें। पत्रकार होने से यह लाभ भ्ाी है कि चीजें पूर्ण रूप से सामने आती हैं। दिमाग हमेंशा चिंतनशील रखकर आप काम कर सकते हैं। यह सब विशेष मुश्किल नहीं है।

-विष्णु नागर को विष्णु नागर बनाने में किसका योगदान है?
वैसे तो मैं कोई ब़ड़ी हस्ती नहीं हूं। पर मुझे बनाने में सबसे पहले मेरे कस्बे साहजहांपुर का योगदान है जहां मैं पला- ब़ढ़ा, वहां के संस्कार मिले। मेरे अध्यापक और उन किताबों का योगदान रहा है जिन्हें मैंने अब तक प़ढ़ा। दिल्ली में मेरा कोई परिचित नहीं था इसके बाद भी मैं दिल्ली चला आया, मेरी उस दु:साहस और जो लोग मिले उन सबका योगदान रहा है। मेरी जीवन संगनी का भी योगदान है क्योंकि उसने मुझे घर में ऐसा वातावरण प्रदान किया कि मैं आराम से चिंतन, लेखन कर सकूं।

ऐसा क्यों है कि आज पत्रकारिता में आम आदमी से जु़ड़े मुद्दे नहीं उठाए जा रहे हैं।

नागर जी-- मुझे कहते हुए थो़ड़ा सा दुख है कि यह हिन्दी पत्रकारिता के लिए ज्यादा सच है। अंग्रेजी के पत्र - पत्रिकाएं इस मामले में कहीं अच्छी हैं। पता नहीं क्यों हिन्दी में सबको लगता है चीजें हल्की- फुल्की होनी चाहिए। कहीं यह सुनने को मिलता है। दुखी आदमी दुख की खबरें प़ढ़ना पसंद नहीं करेगा। और दुख उनके जीवन में लाने से क्या मिलेगा। बाजारी होने में कोई मुक्ति नहीं है। पाठक - पाठक होते हैं उपभोक्ता या उत्पाद नहीं। वैसे जल्द ही पत्रकारों को अपनी सीमा समझ में आ जाएगी। लौटेगी पत्रकारिता मुद्दों और आम आदमी की ओर।

राजनीति और प्रशासन के हाल देखते हुए आम आदमी की समस्या कैसे सुलझेगी।
नागर जी-कलम की एक सीधी सत्ता होती है। पत्रकार और साहित्यकार को यह लग सकता है कि उनकी कलम से अब कुछ नहीं हो रहा पर ऐसा नहीं है। हां यह है कि तत्काल स्थितियां नहीं बदलती पर शुरूआत होने लगती है और यह दिखता भी है। पर कोशिश जरूर करनी चाहिए। कई बार ऐसा होता है लोग यह समझ कर कदम रोक लेते है कि इससे क्या होगा या कोई बाधा न आ जाए। इसी भय को कलम चलने वालों को दूर रखना होगा।

इन दिनों हिन्दी ब्लाग की ब़ड़ी चर्चा है। पर ब्लॉग में स्तरीय साहित्य कम ही हैं। क्या आगे इसका भविष्य हिन्दी साहित्य के हिसाब से ठीक है-
नागर जी-ब्लाग बुरा नहीं है। अभी नया- नया है इसलिए दिक्कतें तो आयेंगी ही। यहां कोई विशेष रोक टोक नहीं है इसलिए हर प्रकार की चीजें आ रही हैं। पर इसमें परिपक्वता आयेगी। समय सब सीखाता है तब यह हिन्दी साहित्य के लिए अधिक उपयोगी होगा। इसके माध्यम से विश्व के अधिकाधिक पाठकों तक पहुचा जा सकता है।

क्या आज पत्रकारिता और साहित्य का मूल्याÄास हुआ है।
नागर जी- आज से पच्चास साल पहले भी यही बातें कही जाती थीं। आज भी कहीं जा रही हैं। सच्ची बात यह है कि जो लोग काम करने वाले होते हैं वे हर हाल में काम कर लेते हैं। पहले भी कई अच्छे लेखक , पत्रकार हुए आज भी हैं। सरोकारों के आधार पर लोग उस जमाने में भी जगह पाते थे और अब भी पा रहे हैं। अच्छी चीजें आज भी आ रहीं हैं और आगे भी आएंगी। उनकी मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। पर लोगों को सकारात्मक नजरिया अपनाना होगा।

हिन्दी साहित्य पाठक तक पहुंच सके इसके लिए क्या करना होगा।

नागर जी- इस समस्या के लिए हर मुद्दे पर सुधार जरूरी है। साहित्य ही नहीं पाठक को भी साहित्य की ओर उन्मुख होना होगा। साहित्य को साधारण पाठक के समझ आना होगा। किताबों के मूल्य आज हिन्दी पाठक के जेब से ज्यादा होती हैं। लेखको को नये विचार और नई चेतना से लैस होना होगा। कुल मिलाकर इस समस्या के लिए काफी प्रयास की आवश्यकता है।

क्या कुछ नया लिखने की तैयारी है

नागर जी- हां एक विषय मेरे दिमाग में काफी समय से है। मौका मिलते ही उस पर लेखन शुरू करूंगा। स़ड़क आधारित उस रचना के केंद्र में दिल्ली होगा। आज स़ड़क भी ताकतवर हो गई। आम आदमी के लिए वहां भी जगह नहीं। इन्हीं चिंतन के ताने- बाने से तैयार होगी रचना।

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

छठ पूजा विधि



ये मेरे लेखन की ही कमी है की मैं छठ के बारे में सही जानकारी नहीं दे सकी. छठ के दौरान लोग सूर्य देव की पूजा करतें हैं , इसके लिए पानी में खड़े होकर उगते और डूबते सूर्य को सूप में प्रसाद चढाते हैं और लोग दूध से अर्ध्य देते हैं प्रसाद बाद में लोगो को वितरित कर दी जाती है. मैं अपनी रिपोट भी पेश कर रही hun

कमर तक पानी में डूबे लोग, हाथ में दीप प्रज्ज्वलित, नाना प्रसाद से पूरित सूप और पास ही लोटे से दूध और जल की गिरती धार, आस-पास गूंजते छठी मैया के गीत। आस्था और विश्वास का यह दृश्य शनिवार को छठ पर्व के दौरान देखने को मिला...
डाला छठ के संझा अरग के दौरान ग्वारीघाट, हनुमान ताल में लोगों का हुजुम उमर प़ड़ा और सारा वातावरण छठ मय हुआ।

सूर्य को दिया गया अघ्र्य- छठ व्रती
महिला और पुरुषों ने घाट पर पहुंचकर स्नान किया। िफर गीले वस्त्रों में ही पश्चिम मुख होकर अस्ताचलगामी सूर्य की आराधना की। छठ व्रती ने सूप में पूजा सामग्री लेकर आराधना की और 5.30 बजे डूबते सूर्य को जल और दूध से अघ्र्य दिया। हनुमानताल में सफाई न होने के कारण लोगों ने घर से नहाकर पूजा की।
हो ही गया इंतजाम- तमाम परेशानियों के बीच लोगों ने छठ के पारंपरिक सामग्री की व्यवस्था कर ही ली। फल-फूल की महंगाई से आस्था विचलित नहीं हुई। छठ व्रती के हाथ पक़ड़े सूप में पूजा में शामिल आठ फल, ठेकुआ, नारियल के साथ ही दीप झिलमिला उठे। घाटों पर अघ्र्य के लिए दूध बांटा गया।
गीतों और ढोल से गूंजे घाट- छठ पूजा के दौरान ग्वारीघाट, हनुमानताल और छठ ताल के घाट पर छठी मैया के गीत से वातावरण गुंजायमान हो गया। जिनके घर में नई शादी हुई थी या नये मेहमान के आने की खुशी थी, उन्होंने खूब ढोल बजवाए। बच्चों ने आतिशबाजी भी की।
अपूर्व हुई सजावट- छठ के लिए सजे घाटों का सौन्दर्य देखने योग्य था।
रंगबिरंगी लाइटों की जगमग रोशनी, झिलमिल पानी में डूबता सूरज और आस-पास भक्तिभाव से ख़ड़े लोग, आस्था का यह नजारा देख सबका मन प्रसन्न हो गया। चाराें ओर लोगों ने बिहारी स्टाइल में घाटों में ईख से अपना-अपना क्षेत्र आरक्षित किया था।
निकल गए स्वेटर- छठ के दौरान नदी किनारे की ठण्डी हवा ने सबको स्वेटर पहनने पर मजबूर किया। आज सुबह वाले अघ्र्य के समय तो हर किसी के तन पर स्वेटर/जैकेट और गले में स्कार्फ होगा।
रविवार को दूसरा अरग- रविवार की सुबह सूर्य किरण दिखते ही लोगों ने उदयाचल सूर्य को अघ्र्य देकर नमस्कार किया।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

छठ हो गया शुरू




बिहार-यूपी के लोग कर रहे छठ पूजा का आयोजन
बिहार के सुप्रसिद्ध पर्व छठ पूजा की शुरुआत हो चुकी है। यूपी-बिहार के काफी लोग जबलपुर में भी निवास करते हैं। छुट्टियों की कमी, रिजर्वेशन न मिलना या यहीं बस जाने वाले लोग पूरे हर्ष-उल्लास से डाला छठ का आयोजन कर रहे हैं। खरना के कारण आज हर तरफ सूर्यदेव की आराधना के पर्व की धूम है-
आदि देव सूर्य की आराधना ऐसे तो संसार में कई जगह होती है, पर यही त्योहार ऐसा है जहां अस्ताचलगामी और उदयांचल सूर्य की पूजा की जाती है।
मनाया गया नहाय-खाय

चार दिन तक चलने वाले इस त्योहार का पहला दिन नहाय-खाय का होता है। गुरुवार को नहाय-खाय की पूजा पारंपरिक उल्लास के साथ संपन्न हुई। इस दिन नहाने के बाद सूर्य को नमस्कार कर भोजन ग्रहण करने का रिवाज है। प्रसाद में चने की दाल और लौकी अनिवार्य होती है।

आज होगी खरने की पूजा-
मुख्य व्रत आज ही प्रारंभ होगा। दिनभर उपवास के बाद शाम को नये चावल की खीर का भोग लगेगा और उसका वितरण किया जायेगा।

पहला अरग कल-
शनिवार को पहला अरग अर्थात सूर्य अघ्र्य का पहला दिन होगा। नदी या तालाब में गीले शरीर से दूध और पानी से डूबते सूरज को अघ्र्य दिया जायेगा।
दूसरा अरग और पारन-
दूसरे अघ्र्य के दिन ही पूजा के बाद छठ व्रती 36 घंटे के उपवास के बाद पारन करते हैं। सुबह उगते सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है।
आयोजन में हो रहीं दिक्कतें-
छठ पूजा में पवित्रता का काफी ध्यान रखना प़ड़ता है। यहां छठ पूजा करने वालों को सभी सामान उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। कच्ची हल्दी, अदरक, सुथनी, अरता जैसी चीजें बिहार में आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, पर यहां के बाजार में नहीं हैं। यही हाल आम की लक़ड़ी और गन्ने के सूखे रेशे का है। इसी प्रकार यहां जिनके पास अपनी चक्की है वे तो गेहूं पीस चुके हैं, पर बहुत से लोग मिलों में छठ पूजा के लिए अलग आयोजन नहीं हो पाने के कारण फल से पूजा करने को विवश हैं।
घाट हो गए साफ-
पहले अरग के दिन सूर्य को अघ्र्य देने के लिए लोग ग्वारीघाट, छठ ताल, हनुमानताल में मुख्य रूप से जाते हैं। हनुमानताल में छठ पूजा को लेकर साफ-सफाई की गई है। रांझी के छठ ताल में पन्द्रह दिन पहले से ही लोग अपने घाट आरक्षित कर रहे हैं। असुविधा को देखते हुए बहुत से लोगों ने अपनी छत पर ही अघ्र्य की व्यवस्था कर ली है।
ग्रामीण जीवन का पर्व-
छठ पूजा ग्रामीण जीवन का पर्व है। गांव में नये अन्न का महत्व अधिक होता है। छठ पूजा में इस मौसम में आने वाले हर नये अन्न फल-फूल से पूजा की जाती है।

आस्था का चरम-
चार दिनों का यह त्योहार शुद्धता और आस्था का चरम रूप होता है। पूजा का हर सामान नियम और निष्ठा के साथ साफ किया जाता है। यहां तक की चिि़ड़यों और कौओं का जूठा सामान भी नहीं च़ढ़ाते हैं।

पौराणिक संदर्भ-
छठ पूजा का पौराणिक संदर्भ भी है। कहते हैं द्वापर में जब पाण्डव वनवास कर रहे थ्ो और उन्हें विजय का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था, तब द्रौपदी ने धैम्य ऋषि से सहायता मांगी। धैम्य ऋषि ने उन्हें सतयुग की कथा सुनाते हुए छठ व्रत करने की सलाह दी। उसी समय से छठ व्रत मनाया जा रहा है।