रविवार, 18 जनवरी 2009

मेरे हिस्से की धूप








ठण्ड से ठिठुरती
गर्माहट की चाह लिए
आ पहुँची हूँ -
खुले में
ठिठुरन कायम है
गर्माहट का अहसास नही
सब तो घूम रहें हैं
खिले- खिले से -
पल्लवित हो
बस मैं रह गई
बनके कूप
जाने कौन ले उड़ा
मेरे हिस्से की धूप

17 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

सुंदर चित्र ओर बहुत ही सुंदर कविता, दुसरा चित्र तो लगत है हमारे यहां का ही हो.
धन्यवाद

हिमांशु ने कहा…

पहले मैने सोचा, चित्र ही आप की कविता के पहरुए बन कर हमें वह संवेदना दे जायेंगे. बाद में जाना नीचे है हमारे हिस्से की कविता की धूप.
धन्यवाद.

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

बेहतर भावाभिव्यक्ति के लिये साधुवाद....

MUFLIS ने कहा…

इतने कम शब्दों में मनोभाव की इतनी सुंदर अभिव्यक्ति...!
लेकिन विस्तार.... खुले आकाश का पूरा विस्तार आप ही का है...
इस काव्य का विस्तार बनाए रक्खें . . .
बहोत ही सुंदर रचना है, बधाई स्वीकारें....!!
---मुफलिस---

SANJEEV MISHRA ने कहा…

बेहद संक्षिप्त परन्तु अत्यन्त सुंदर , भाव एवं शब्द दोनों ही बहुत सुंदर हैं .

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) ने कहा…

जाने कौन ले उड़ा
मेरे हिस्से की धूप...............
कभी-कभी तो लगता है कि
खुदा से भी हो जाती है चूक

समयचक्र - महेद्र मिश्रा ने कहा…

भाव एवं शब्द,अत्यन्त सुंदर.

vivek ranjan shrivastava ने कहा…

धूप के बिम्ब पर मेरी भी है एक रचना
http://vivekkikavitaye.blogspot.com
उठो जोपडी
पढ़ो विकास के पहाडे
तुम्हारी पूँजी है तुम्हारी सँख्या
तुम्हारी शक्ति है तुम्हारा श्रम
तुम्हें रिझाने चली आ रही हैं दुनियाँ
देखो छप्पर के सूराख से
सूरज झाँक रहा है
लेकर बेतहाशा सुरमई धूप
तुम्हारे हिस्से की
और घुसा आ रहा है
ताजी हवा का झोंका
तुम्हारा
पसीना पोंछने !
प्रस्तुतकर्ता vivek ranjan

Irshad ने कहा…

एक अलग नजरिये के साथ आपने अपनी बात को रखा। बहुत ही सुंदर चित्र महसूस किया जा सकता है

hem pandey ने कहा…

गंभीर एवं सुंदर अभिव्यक्ति के लिए साधुवाद.

sandhyagupta ने कहा…

Aapki kavita me kai arth chupe hue hain.Unme se ek ling bhedh ki taraph sanket karta hai.

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

कम शब्दों की सुंदर कविता !

कविता के भाव मन को विचलित करते हैं !

मैंने जब कविता को ध्यान से पढ़ा तो इसमें कई बिम्ब उभरते दिखायी दिए !

कविता को कई "एंगल" से पढ़ा जा सकता है !

अनिल कान्त : ने कहा…

कविता के कई भाव हैं .....मजा आ गया

अनिल कान्त
मेरा अपना जहान

मोहन वशिष्‍ठ ने कहा…

ठण्ड से ठिठुरती
गर्माहट की चाह लिए
आ पहुँची हूँ -
खुले में
ठिठुरन कायम है
गर्माहट का अहसास नही
सब तो घूम रहें हैं
खिले- खिले से -
पल्लवित हो
बस मैं रह गई
बनके कूप
जाने कौन ले उड़ा
मेरे हिस्से की धूप

बेहतरीन कविता ढेरों बधाई

विक्रांत बेशर्मा ने कहा…

बहुत ही शानदार रचना है!!!!!!!!

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

आपके ब्लॉग पर आकर सुखद अनुभूति हुयी.इस गणतंत्र दिवस पर यह हार्दिक शुभकामना और विश्वास कि आपकी सृजनधर्मिता यूँ ही नित आगे बढती रहे. इस पर्व पर "शब्द शिखर'' पर मेरे आलेख "लोक चेतना में स्वाधीनता की लय'' का अवलोकन करें और यदि पसंद आये तो दो शब्दों की अपेक्षा.....!!!

मोहन वशिष्‍ठ ने कहा…

गणतंत्र दिवस की आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं

http://mohanbaghola.blogspot.com/2009/01/blog-post.html

इस लिंक पर पढें गणतंत्र दिवस पर विशेष मेरे मन की बात नामक पोस्‍ट और मेरा उत्‍साहवर्धन करें