रविवार, 22 जनवरी 2012

जंगल के जानवर







देखने को जंगली जानवर
किसने जू बनवाया
आओ मेरे साथ
हर मोड़ पर
करा सकती हूँ
जानवर से साक्षात्कार
सांप हो या नेवला
हिरन हो या शेर
भेड़े और भेड़िया
मनुष्य के अंदर
मिलती है हर किस्म
और तो और
जरुरत के हिसाब से
शेर खता है तिनका
सांप नेवले के
लगता है गल
जंगल बस्ता है शहर में
जाने जंगल में अब कौन है ?

सोमवार, 7 फरवरी 2011

चलो नया वैलेंटाइन मनाएं




इस बार नक्षत्र युवाओं पर काफी मेहरबान हैं। वैलेंटाइनवीक के साथ ही बसन्त पंचमी और अन्य त्योहार आऐं हैं। वेलेंटाइन डे को लेकर युवाओं का उत्साह चरम पर है। प्रेम के पर्व की उमंग को इस साल हिंदू धार्मिक पंचांग का भी पूरा समर्थन मिल रहा है। सात फरवरी से शुरू हो रहे वेलेंटाइन वीक के हर दिन कोई न कोई पारंपरिक पर्व है। कई बंदिशों के कारण घर से निकलने में कतराने वाले प्रेमी जोड़ों को इस बहाने मिलने का खूब अवसर है। वेलेंटाइन वीक का पहला दिन रोड डे के रूप में मनाया जाता है। जबकि उसी दिन गणेश चतुर्थी है। आठ फरवरी को प्रपोज डे के दिन ही बसंतपंचमी है, जिसे मदनोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। वहीं 13 फरवरी को किस डे के मौके पर गुप्त नवरात्र की विजयादशमी है।

कौन सा दिवस कब
पाश्चात्य पर्व भारतीय पर्व
7 फरवरी -रोज डे- गणेश चतुर्थी
8 फरवरी -प्रपोज डे बसन्त -पंचमी, मदनोत्सव
9 फरवरी -चॉकलेट डे- मन्दार षष्टी
10 फरवरी- टेडी डे -रथ सप्तमी
11 फरवरी प्रामिस डे भीष्म अष्टमी
12 फरवरी -हग डे - महानन्दा नवमी
13फरवरी -çकस डे –विजय दशमी
14फरवरी-वेलेंटाइन डे -जया एकादशी

शनिवार, 27 नवम्बर 2010

डर और प्रेम








प्रेम बस नाम ही है
किसी सुखद एहसास का
उसका एहसास ही
भूला देता है सारे सुख
बचता है फिर
सिर्फ और सिर्फ डर
डर, प्रेम के उजागर हो जाने का,
डर ,साथ साथ देखे जाने का,
डर, साथ छूट जाने का,
डर, प्रेम में छले जाने का,
डर, प्रेम का ‘शादी के द्वार आने/ न आने का
डर,प्रेम का समय के घोड़े की पीठ से फिसल जाने का
डर, प्रेम की जगह किसी और आकशZण में बंधे रह जाने का
डर- डर- डर और डर

सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

कुछ मीठा हो जाये







टीवी पर कैटबरी चॉकलेट का एक विज्ञापन आजकल युवाओं और टीनेजरों के बीच खासा लोकप्रिय है। इसमें एक लड़ बस स्टाप पर चाकलेट खाती एक लड़की से चाकलेट का टुकड़ा मांगता है, क्या मैं आपको जानती हूं? कहकर लड़की इनकार कर देती है। मेरी मां कहती है कोई शुभ काम करने से पहले मीठा जरूर खाना चाहिए ,कहकर लड़का सफाई देता है। साफगोई और मां की बात सुनकर लड़की उसे चाकलेट का एक टुकड़ा दे देती है साथ ही पूछ लेती है आप कौन सा शुभ काम करने जारहे थे। जवाब होता है मैं आपको घर छोड़ना चाहता हूं। और दोनों मुस्कुराते हैं।
मतलब हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा हो गया। दूसरे का चॉकलेट लेकर उसे खिलाकर आप दोस्ती कर सकते हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अब मुंह मीठा करने का मतलब मिठाई या गुड़, खीर, सेवई, फिरनी, दही शPर न होकर चॉकलेट खाना हो गया है। इससे पहले पप्पु पास हो गया के विज्ञापन मे भी मिठाइयों पर चॉकलेटों की जीत दिखाई जाती रही है।
त्योहरों के लिए भी ये कंपनियां काफी पहले से तैयारी करती हैं। त्योहार पर इनके स्पेशल पैकेट और पैकेज आते हैं। मध्य वर्ग निम्न वर्ग, उच्च वर्ग को ध्यान मे रखकर अलग अलग वेरायटी, रेट और टेस्ट लांच किए जाते हैं। इनके इतने प्रचार प्रसार का ही नतीजा है कि अब त्योहारों मे और घर घर के पप्पुओं के पास होने पर चॉकलेट खिलाकर खुशियां मनाई जाने लगी हैं। शादियों में भी मिठाइयों के साथ एक खेप चॉकलेट की भी वर वधू की ओर से भेजी जाती है।
मिठाई की जगह चॉकलेट का प्रवेश सिर्फ मिठास और स्वाद मे अन्तर की बात नहीं है बल्क यह हमारी संस्कृतिको रौन्दने की गुपचुप कोशिश है। मिठाईयां त्योहारों या अन्य दिनों में खाया जाने वाला खाद्य पदार्थ ही नहीं हैं वरण वे हमारी संस्कृति हमारे जीवन का हिस्सा हैं। त्योंहारों पर घर मे बनी मिठाईयों में सिर्फ शक्कर का स्वाद नहीं होता बçल्क उनमें त्योहार का उल्लास, मेहनत की खुशबू और प्यार की मिठास होती है।
जरा उस दिन की कल्पना कीजिए जब होली में गुçझए माल पुए, रक्षा बंधन में मिठाइयं, दीपावली में लड-्डू या अन्य मिठाईयां, दशहरे, पन्द्रह अगस्त, छब्बस जनवरी में जलेबी, तिल संक्रंाति में तिल मुरही लड्डू, छठ मंे ठेकुआं, रामनवमी के रोट, शादीयों में बनने वाले खाजा, गाजा, बालूशाही, बताशे सबकी जगह सिर्फ चॉकलेट ही होगे तो क्या होगा? कैसा त्योहार होगा हमारा। आज एड फिल्म और रंग बिरंगे रैपर्स के कारण जो चॉकलेट लुभावने लगते हैं। क्या वे मिठाइयों की जगह ले सकेंगे? लेकिन बाजर की ताकत हमारे मन मस्तिष्क मंे यह भरने की लगातार कोशिश कर रहा है कि ये मिठाईयों के बेहतर विकल्प हैं।
बाजार इनका इतने जोर शोर से प्रचार इसलिए कर पात है क्योंकि ये खास नाम वाले अथाüत ब्राण्ड के होते हैं। बाजारवाद को देखते हुए हम चाह कर भी देसी रसगुल्ल्ो , बरफी या अन्य मिठाईयों की ब्राण्डिंग नहीं कर सकते । देश भर में घर घर, गली मुहल्ले की दुकानों या ठेले ,गांव के मेले मेंबिकने वाली ये मिठाईयां çकसी एक कंपनी के एकाधिकार मंे न हैं और न होने की संभावना ही है। ऐसे में बाजारवाद के खिलाफ खड़े होकर कौन इनका प्रचार करेगा। इनके विज्ञापन में करोड़ों रूपये खर्च करेगा। हमारी विविधता की संस्कृति ऐसी है कि एक ही मिठाई जितने हाथ से बनेगी उसमें उतने प्रकार के स्वाद आ जायंेगे। अथाüत अगर अपनी विविध मिठास से भरी संस्कृति को बचाना है तो हर çकसी को अपने स्तर पर ही प्रयास करना होगा। नूतन का स्वागत करना चाहिए पर उतना ही जितने से पुरातन •े अस्तिव पर न बन आए।

सोमवार, 24 मई 2010

एक छोटी सी मुलाकात नामवर सिंह से


कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए गुंजाइश कम है
। समालोचना के पितामह के नाम से विख्यात नई कहानी, नई कविता के नये प्रतिमान रचने वाले नामवर सिंह से छोटी सी मुलाकात-
- माक्र्स के बाद का विश्व काफी बदल चुका है। पर माक्र्सवाद के सिद्धान्तों में फेर- बदल नहीं हुए हैं। कम्युनिस्ट पाटीoयों की असफलता के पीछे यही कारण तो नहीं?
एक दौर था जब संसार के अधिकतर भाग में कम्युनिस्ट पाटीo की सरकार थी। भारत में भी सबसे सशक्त विपक्ष पाटीo कम्युनिस्ट पाटीo ही थी। पर धीरे-धीरे रूस,चीन में खत्मा हुआ और दूसरी जगहाें पर भी। एक समय भारत में कई राज्यों में कम्यूनिस्ट पाटीo काफी मजबूत अवस्था में थी। बाद में विकास की अवधारणा बदली। राजनीति का स्वरूप बदला और आरक्षण जैसी चीजें आ गई। दूसरी पाटीoयां कम्युनिस्ट पाटीo के एजेण्डे लेकर सामने आ रही हैं। अब कम्युनिस्ट आन्दोलन के लिए गुंजाइश कम है।
-अब पूंजीवाद अपने नये रूप में सामने आ गया है। इससे कैसे निकला जाएगा।
नये अर्थतन्त्र के कारण परिवर्तन तो आया है। एक शेर इस मसले पर सटीक है-
शेख ने मजिस्द बना, मिस्मार बुतखाना किया
तब तो एक सूरत भी थी,अब साफ वीराना किया।
यही हाल है अब और पूंजीवाद का नया स्वरूप कुछ ऐसा है। माक्र्स ने कहा था पूंजीवाद के अन्दर ही इसका इलाज है। क्षमताओं आवश्कताओं के बीच सन्तुलन बैठाकर हल निकल सकता है। यूं विकास के लिए पूंजीवाद जरूरी है लेकिन पूंजीवाद कैपिटलाइज करती है। चीजों को निर्जीव बना देती है। ताजा उदाहरण्ा आईपीएल प्रकरण है। पूंजीवाद के छूते ही बल्ले से सोना उछलने लगा और परिणाम सामने है। इसलिए सावधानी अपेक्षित है।

-ज्ञानरंजन के प्रलेस छोड़ने को आप किस रूप में देखते हैं
ज्ञानरंजन पहल के लिए समिर्पत रहे हैं। उनका कोई साहिित्यक संगठन नहीं भी था और अब तो पहल भी बन्द हो गई है। जाने कब से उन्हाेंने प्रलेस की मीटिंग, संगोष्ठी में जाना बन्द कर दिया था। इसलिए उनका प्रलेस से जाना कोई बड़ी क्षति नहीं रहा।
-प्रलेस की प्रगति सन्तुष्ट करने योग्य है?
वर्तमान में तीन संगठन कार्य कर रहे हैं- प्रलेस, जलेस और जसम। इनमें सबसे अधिक सक्रिय प्रलेस ही है। इसकी पाटीo से भी बड़ा इसका कद है और इसका मंच भी बड़ा है। इसकी पत्रिका वसुधा काफी अच्छी निकल रही है। बेस बड़ा हो तो अधिरचना बड़ी होती ही है। जलेस का पाटीo की अपेक्षा सांस्कृतिक मंच बड़ा है और नये लेखक इससे जुड़े भी है। लेकिन इसकी सक्रिया प्रलेस से काफी कम है। और जसम तो काफी पिछे है।
-क्या परसाई जी के बाद व्यंग्य विद्या का उत्रोत्तर विकास हुआ है या वो वहीं ठहरी हुई है।
परसाई व्यक्ति न होकर संस्था थे। कोई भी विषय उनकी पैनी नज़र से छूटा नहीं खास कर राजनीति मंें उनका पैनापन देखने योग्य है। और यह सब उन्होंने जबलपुर में रहते हुए किया। वे लेखन के प्रति जितने समिर्पत थे और जितना लिखा उतना तो किसी ने लिखा भ्ाी नहीं है। हिन्दी में दूसरा परसाई होने की संभावना नहीं है।
समालोचना में नई प्रतिभाएं सामने आ रही हैं लेकिन पाठ्यक्रम से समालोचना गायब हो रहे हैं
पाठ्यक्रम से समालोचना गायब करके कुछ हासिल नहीं होगा क्योंकि परीक्षा से गायब करना किसी के वश में नहीं हैं। हां यह एक बड़ी अच्छी बात है कि युवा समालोचक काफी अच्छा लिख रहे हैं। और समालोचना के अच्छे भविष्य की ओर इशारा कर रहे हैं।
पत्रकारिता की आज की स्थित पर क्या कहना चाहेंगें
इंटरनेट क्रान्ति ने पत्रकारिता का नक्शा और ढांचा बदल दिया है। छापे वाली पत्रकारिता दूसरी तरह की चीज हो गई है। पत्रकारिता का सच यह है कि अब पेड न्यूज छप रही है। पत्रकार नाम की संस्था खत्म हो गई। पूंजीवाद हावी हो गया है। भाषायी पत्रकारिता का हाल बुरा है। सम्भवत: मलयालम पत्रकारिता ठीक है। बल्कि मैं कहूंगा कि हिन्दी पत्रकारिता ने मुझे बहुत निराश किया है।
-पत्रकारिता की भाषा को लेकर कई सवाल उठते रहते हैं। पत्रकारिता कहती है वो आम आदमी की भाषा से जुड़ रही है आप इस विषय में क्या कहना चाहेंगे
कौन कहता है यह आम आदमी की भाषा है। आज तो हिंिग्लश लिखा जा रहा है। आज के पत्रकार भूल गए हैं कि मुंह से पहले कान खुले रखने चाहिए। भाषा की ताकत से अनजान कुछ भी लिखते- कहते रहते हैं। कमला खान और विनोद दुआ जैसे पत्रकार भी हैं। उनकी लोकप्रियता बताती है कि आम आदमी अच्छा पसन्द करता है।
-नक्सलवाद से देश भर के लेखक जुड़ रहे हैं। हिन्दी साहित्य में इस पर रचनाएं क्यों नहीं आ रही हैं।
क्रान्तिकारी विचार कई शक्ल में आते हैं। ऐसी रचना तब बाहर आती है जब गुस्सा दर्द में बदलता है। हलांकि कुछ काम हुआ है पर अभी और बाकी है। क्रोध करूणा दोनों एक साथ होगी तो इससे सम्बंधित चीजें बाहर आयेंगी।

बुधवार, 17 मार्च 2010

एक मुलाकात वीरेन डंगवाल से


जब उनकी कलम चलती है सब चमत्कृत रह जाते हैं। कविता, प्राध्यापन, पत्रकारिता हर क्षेत्र में उनकी कोई सानी नहीं है। पत्रकारिता में सनसनी और सांप्रदायिकता के घोर विरोधी होने के साथ ही वे अपनी बेबाक कथन के लिए जाने जाते हैं। हमबात कर रहे हैं प्रसिद्ध कवि / पत्रकार वीरेन डंगवाल की। वीरेन साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत कई सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। दो दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में संस्कारधानी आए वीरेन से छोटी सी मुलाकात-
कविताओं के बारे में यह कहा जाता है कि आज के युवा उनसे दूर भागते हैं आपकी कविताओं के साथ स्थिति ठीक उल्टी कैसे है?
-कविता लिखते समय यह ख्याल रखता हूं कि वो दूसरों तक पहुंचे।हर रचना को कहीं न कहीं जाना ही होता है तो क्यों न वो पाठकों तक पहुंचे। दूसरी बात है कि हर कवि का अपना स्वभाव होता है। अगर जितने जटिल समय में कविता लिखी जा रही हो, उतनी ही जटिलता उसमें ला दी जाये तो कविता का हाल बुरा हो जाता है।
-लघु पत्रिकाओं का हिन्दी साहित्य में बड़ा योगदान है पर शुरू से आज तक वो बीच में ही दम तोड़ती रही हैं। इसके लिए क्या समाधान होना चाहिए?
-लघु पत्रिकाओं की बुनियाद में ही टूटना है। यही उनकी सीमा है और ताकत भी। लघु पत्रिकाओं का आना- जाना साहित्य के लिए शुभ ही हैं। क्योंकि यदि वे प्रतिष्ठान बन जायेंगी तो उनका व्यक्तित्व विखर जायेगा और वे साहित्य का पोषण कहां कर सकेंगी।
-हिन्दी में ब्लॉग बड़ी तेजी से उभर रहे हैं, इसका साहित्य पर क्या प्रभ्ााव होगा
- ब्लॉग में अराजकता और निरंकुशता तो है। क्योंकि वहां आदमी स्वयं मूल्यांकन करता है। अभ्ाी इसकी शुरूआत ही है इसलिए ठीक है। आगे इसकी दिशा बदलेगी।
-पत्रकारिता विभिन्न बदलावों से गुजर रही है, इसे किन रूपों में देखते हैं?
- अखबारों का सकुoलेशन और आजार बढ़ रहा है। पर उनके कंटेट और कन्सर्न कम हुए हैं। बदलाव तो आने ही चाहिए पर इसका डेमोक्रेटिक चरित्र जरूर सुरक्षित रहना चाहिए। सबसे बुरी दशा भाषा की है।
सम्भवत: नये परिपेक्ष्य में भाषा का बदलना आज की जरूरत है।?
-नहीं । अब घटिया भाषा परोसी जाती है और मान लिया जाता है कि पाठक यही चाहता है। अपर मीडिल क्लास की भाषा को मान्य भाषा के तौर पर महत्व दिया जा रहा है। अखबार शायद यह भूल रहे हैं कि वे भ्ााषा और विवेक का संस्कार सीखाने का काम करते हैं। कुछ अखबारों ने इसे बचाकर रखा है। नई दुनिया पुराने समय से ही पत्रकारिता की ही ट्रेनिंग सेंटर रहा है। इसी से इसका भारतीय पत्रकारिता में स्थान है।
आपने अनुवाद पर काफी बढ़िया काम किया है। पर इस क्षेत्र में अन्य लोग कम क्यों हैं?
अब तो स्थिति काफी बदली है अनुवाद के क्षेत्र में बहुत सारे लोग आगे आ रहे हैं।
कुछ नया कर रहे हैं?
नया करने की प्लानिंग तो है। कुछ कविताओं पर काम कर रहा हूं। शमशेर और मुक्तिबोध पर काम करने की इच्छा है। इसके अलावा भी कुछ है पर वो पूरा होने के बाद ही सामने आयेग।

वीरेन डंगवाल की एक कविता
दुष्चक्र में सृष्टा

कमाल है तुम्हारी कारीगरी का भगवान,
क्या-क्या बना दिया, बना दिया क्या से क्या!

छिपकली को ही ले लो,
कैसे पुरखों
की बेटी छत पर उल्टा
सरपट भागती छलती तुम्हारे ही बनाए अटूट नियम को।
फिर वे पहाड़!
क्या क्या थपोड़ कर नहीं बनाया गया उन्हें?
और बगैर बिजली के चालू कर दी उनसे जो
नदियाँ, वो?
सूंड हाथी को भी दी और चींटी
को भी एक ही सी कारआमद अपनी-अपनी जगह
हाँ, हाथी की सूंड में दो छेद भी हैं
अलग से शायद शोभा के वास्ते
वर्ना सांस तो कहीं से भी ली जा सकती थी
जैसे मछलियाँ ही ले लेती हैं गलफड़ों से।

अरे, कुत्ते की उस पतली गुलाबी जीभ का ही क्या कहना!
कैसी रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर
स्वाद की मर्मज्ञ और दुम की तो बात ही अलग
गोया एक अदृश्य पंखे की मूठ
तुम्हारे ही मुखड़े पर झलती हुई।

आदमी बनाया, बनाया अंतड़ियों और रसायनों का क्या ही तंत्रजाल
और उसे दे दिया कैसा अलग सा दिमाग
ऊपर बताई हर चीज़ को आत्मसात करने वाला
पल-भर में ब्रह्माण्ड के आर-पार
और सोया तो बस सोया
सर्दी भर कीचड़ में मेढक सा

हाँ एक अंतहीन सूची है
भगवान तुम्हारे कारनामों की, जो बखानी न जाए
जैसा कि कहा ही जाता है।

यह ज़रूर समझ में नहीं
आता कि फिर क्यों बंद कर दिया
अपना इतना कामयाब
कारखाना? नहीं निकली कोई नदी पिछले चार-पांच सौ सालों से
जहाँ तक मैं जानता हूँ
न बना कोई पहाड़ या समुद्र
एकाध ज्वालामुखी ज़रूर फूटते दिखाई दे जाते हैं कभी-कभार।
बाढ़ेँ तो आयीं खैर भरपूर, काफी भूकंप,
तूफ़ान खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब
खूब अकाल, युद्ध एक से एक तकनीकी चमत्कार
रह गई सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी
वर्दियां जैसे
मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए
एक जैसी हुंकार, हाहाकार!
प्रार्थनाग्रृह ज़रूर उठाये गए एक से एक आलीशान!
मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
ऊँगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार?

अपना कारखाना बंद कर के
किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान?
कौन - सा है वह सातवाँ आसमान?
हे, अरे, अबे, ओ करुणानिधान!!!

शनिवार, 27 फरवरी 2010

होली की शुभकामना



होली का त्यौहार आ गया है सालभर लोग पानी बर्बाद करते हैं और होली के समय हल्ला करते है सुखी होली खेल कर पानी बचाएं क्या हम ऐसा नही कर सकते की साल भर पानी बचाए और एक दिन जमकर होली खेलें मगर प्राकृतिक रंगों से. गौर फरमाइयेगा. होली की शुभकामना