शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

विजय

vijay sirf
शहरी जिंदगी व्यस्ततायें ही व्यस्ततायें, शाम हो या सुबह । बस भाग दौड़ । ऐसे में जब खुद बनाने की भी नौबत आयी है तब विजय की याद आना स्वाभाविक ही है । उसे रहते मुझे कोई काम करने की जरूरत ही कहॉं पड़ती थी । विजय एक नौकर था, कहना उचित नहीं है । वह इतना कर्तव्यपरायण था कि उसे अभिभावक ही कहना पड़ेगा ।

जब मैं उसके संपर्क में थी, वह चौदह वर्ष का रहा होगा । गहरा सॉंवला रंग, उम्र के हिसाब से औरसत उसकी लम्बाई । गोल-चेहरा, जिस पर छोटी-छोटी काली ऑंखे, थोड़े चपटे लेकिन संतुलित नाक के साथ सुन्दर दिखती थीं । आगे ललाट पर गोलाई में कटे बाल उसके चेहरे को और गोल बनाते थे । कभी-कभी लड़कियॉं जब मजाक के मूड़ में होतीं तो उसे `लालकूट ` कहकर छेड़ती ! पहनावे में एक लम्बी बनियान और हाफ पैंट बस । पॉंव में चप्पल आदि पहने मैंने उसे कभी देखा नहीं ! उसमें गजब की फुर्ती थी । अभी यहॉं और अगले ही पल वहॉं । बीस-पच्चीस लड़कियॉं, वार्डन और उनके बच्चे जब-तब विजय विजय पुकारते रहते और विजय विद्युत की गति से दौड़ कर न सिर्फ सबके पास पहुॅंचना बल्कि सबकी मॉंगे भी पूरी करता । शुरू-शुरू में खाना-परोसते, खिलाते काम करते विजय की ओर मैंने अधिक ध्यान नहीं दिया । एक दिन मैं दवा खरीदने अकेली जा रही थी तब वार्डन ने विजय को साथ ले लेने की सलाह दी । एक आवाज पर वो मेरे साथ हो लिया । थोड़ी ही दूर लाने पर मुझे ज्ञात हुआ विजय साथ नहीं है । मुड़कर देखा तो वो पीछे-पीछे आ रहा था । मैं उसके लिए रूकी । जब वो पास आया तो मैंने चलना प्रारंभ किया, साथ ही अपनी चाल धीमी कर दी । थोड़ी देर बाढ़ वह पुन: पीछे था । मैंने फिर से इंतजार किया । पास आने पर पूछ बैठी -तुम इतना धीरे चलते हो । वह हॅंसने लगा । हॅंसी तो मैं भी पर मुझे आश्चर्य हो रहा था । वह रूक कर बोला-दीदी मैं तो बहुत तेज चलता हॅंू, इतना कि आप मेरे साथ चल भी नहीं सकेंगी । मुझे पूछना पड़ा- आखिर तब से इतना धीरे क्यों चल रहे थे । मुझे बार-बार तुम्हारे लिए रूकना पड़ रहा है । उसने बड़ी शांत आवाज में कहा, ``मैं आपके बराबर में कैसे चल सकता हॅंॅू``- नौकर होकर ! उसे फटे होंठ मुस्कुराते रहे, मैं आवाक् थी । फिर भी बोली ``मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है । मैं अन्य लड़कियों जैसी नहीं हॅंू । मेरे साथ आये हो तो मेरे साथ चलो ।`` वह हॅंसा और मेरे साथ चलने लगा । पर उसका साथ बड़ा ही निराला निकला । दरअसल वह मेरे समानांतर लेकिन काफी दूर चल रहा था ।
सुबह 6 बजे ही वह हर दरवाजा खटखटा कर सबको चाय सर्व करता । प्राइवेट हॉस्टल की वजह से हर लड़की के कोचिंग या क्लासेस के टाइम्स अलग थे । वह न सिर्फ सबका समय याद रखता बल्कि उसी हिसाब से नाश्ता या खाना बनाकर खिलाता भी था । हम आश्चर्य करते इतना छोटा बच्चा अकेले इतने लोगों का खाना कैसे बनाता होगा । मैं जब भी ऐसा कोई प्रश्न करती तो जबाब मिलता, ``हो जाता है दीदी, आदत हो गई है । हॉं, अगर संतोष मेरा साथ देता तो काम और भी जल्दी पूरा होता । पूरा, वह बहुत आलसी है ।बहुत धीरे-धीरे काम करता है । सब्जी काटने में ही आधा घंटा लगा देता है, इसी से उससे कुछ कहने की अपेक्षा मैं खुद ही कर लेता हूॅं ।`
` एक दिन जब सुबह-सुबह मैं हॉस्टल में ही थी, तभी विजय का एक और रूप देखा । वह तेजी से मेरे पास कमरे में आया और बोला-`` दीदी, मैं दरवाजा सटा दे रहा हॅंू, पंद्रह मिनट के बाद ही बाहर निकलिएगा ।`` इसी से बाहर निकल कर देखना जरूरी हो गया । दरवाजा आधा ही खोला कि देखा विजय `स्वीपर` के साथ आ रहा है । जब तक वह सारे बाथरूम, ट्वायलेट साफ करता रहा, विजय ने एक कदम उसके पास और दूसरा किचन में रखा । शाम के नास्ते के समय मैंने अन्य लड़कियों से चर्चा की ता पता चला विजय तो बस विजय ही है । किसी भी बाहरी पुरूष के आते ही वह रक्षार्थ सर्तक रहता है । अटैच बाथरूम वाले कमरे से लड़कियों को बाहर निकाल कर ही स्वीपर को अंदर आने देता है । मैं उस पर मुग्ध हुए बिना न रह सकी । उसी रात एक अविश्वसनीय सत्य से मेरा साक्षात्कार हुआ । रात करीब बारह बजे मैं टेबललैम्प जलाकर पढ़ रही थी । तभी रजनी मेरे कमरे में आयी और बोली, ``चल देख न विजय को कितना पीट रही हैं ।`` मैं हड़बड़ा कर खड़ी हो गई । विजय को ? विजय को भला कौन पीट सकता है ? अरे आन्टी लोग और कौन? चल न,बाहर । ``किचन से आवाजें आ रही है । रजनी की बात पर मैं अस्त-व्यस्त बाहर निकली । सचमुच किचन से रोने चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं । चप्पलों की खटाक-खटाक के बीच अचानक खट से आवाज आयी-जैसे कोई धातु का सामान गिरा हो । हम दोनों चिंतित हो गयीं । क्या करें अब?पर बारह बजे रात को हम बगल के ब्लॉक में बने किचन में जाने का कोई बहाना नहीं ढूंढ़ सकीं । रात का खाना, चाय सब हमें मिल चुका था । पानी था ही । तब आधे घण्टे तक धुलाई की आवाज सुनतीं रहीं फिर अपने-अपने कमरे में चली गई । मन बहुत अशांत था आगे पढ़ना नहीं हो सकेगा,सोचकर बत्ती बुझा दी । पर कमरे का अंधेरा मन पर हावी हो गया । बेचारा..........भला उससे क्या गलती हुुई होगी ? इतना कर्मठ इतना सेवापरायण यहां तक की हर लड़की का ख्याल अपनी बहन की तरह रखता है, रजनी कह रही थ्ाी-हर-पंद्रह दिन के बाद यही सब होता है । उसे मार खाते सुनकर, जानकर भी हम कुछ नहीं कर सकी । नींद आंखों से दूर हो चुकी थी । बार-बार उसका मुस्कुराता चेहरा आंखों के चारों ओर घूम रहा था । जैसे ही आंख बंद करती वहीं मासूम चेहरा । मन में ढेरों बातें आयीं । अगर विजय इसी पीटता रहता है तो यहां काम क्यों करता है । छोड़ क्यों नहीं देता यह नौकरी? कल मैं पूछूंगी । हॉं, मैं तो उसे काम छोड़ने की सलाह दूंगी। इस तरह भला कोई मार खाता है । आह ! कैसी चीख थी ? विजय और उसकी समस्याओं मेंं अटका मन जब थक गया तो नींद आ सकी ।
सुबह उठने पर रात की बात याद आयी । बेचारा विजय शायद अभी तक सिसक रहा हो । क्या जाने पीड़ा की वजह से वह सो सका होगा या नहीं । चलो, अब तो आज बिना नाश्ता किए ही जाना होगा । तभी गिलासों की खनखनाहट सुनाई दी । चाय? चाय कौन लाया? मैं सोच ही रही थी, तभी दीदी, अपने चिरपरिचित अंदाज में पुकारते हुए वह अंदर आया । चाय का ग्लास टेबल पर रख, जाने को मुड़ा । उसकी कार्यशैली देख विश्वास करना मुश्किल हो रहा था कि यही विजय रात को पीट रहा था । विजय ! मैंने संजिदा आवाज में पुकारा । वह पीछे पलटा और मुस्कुराया ! मुस्कुराहट के बावजूद उससे चेहरे पर वेदना झलक रही थी । होंठ और गाल सूजे हुए थे । ऑंखें अत्यंत उदास और पीली थी । इतना छोटा बच्चा और कैसे अपना गम छुपाना जान गया है । मैं सोचती रही और परीक्षक की दृष्टि से उसे देखती रही । जाने कैसे वह मेरे मन की बात जान गया और बोला, दीदी, ये तो रोज की बात है । कुछ नया नहीं है आप चिंता मत कीजिए । लेकिन तुम कोई मार खाने लायक गलती कर सकते हो क्या? तुमने ऐसा क्या काम किया था ! मेरा कुतुहल बरकरार था । बाद में दीदी चाय ठंड़ी हो जाऐगी, देने जा रहा हॅंू, कह, वह जाने लगा । मैंने उसकी बॉंह पकड़ ली- तुम बात तो नहीं टाल रहे हो । कोई फायदा नहीं है, दीदी । कुछ नहीं हो सकता ! अब उसकी ऑंखे डबडबाने लगीं । सांत्वना पा कहीं उसके जख्म हरे न हो उठे ! इसलिए उसे जाने दिया । दोपहर के बाद मैं निश्चित बैठी थी । अचानक तेज कदमों से चलता विजय दिखा । मैंने उसे पुकार लिया । पास आकर वह किसी अपराधी की भांति खड़ा हो गया-``बड़ी जल्दी में हो क्या ?`` मैंने हल्क-फुल्क अंदाज में बात शुरू करनी चाही । ``हॉं दीदी! शाम का नाश्ता बनाना है !`` कह, मुझपर भेद भरी दृष्टि डाली ! मैं सब कुछ जानने को आतुर थी, इसी से विजय को जाने नहीं देना चाहती थी । घुमा-घुमाकर बात करने का समय न पा, मैंने सीधे-सीधे ही सवाल किया-रात में क्या हुआ था ? ``दीदी, आप लोगों को रात की चाय देने के बाद नींद आने लगी थी, इसलिए मैं सोने जा रहा था । आन्टी आयीं और पूछने लगीं कि सुबह नाश्ते के लिए आलू उबाले या नहीं । मैंने बता दिया कि नींद आ रही है, सुबह जल्दी उठकर सब कर दूॅंगा ! बस.......... और कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी दीदी, आण्टी और मनोज भैया दोनों ने मिलकर.....!`` आगे के शब्द आंसुओं में डूब गये ।
किसी लोहे आदि से भी मारा था क्या ? मैंने हर बात अच्छी तरह जानने के लिए पूछा? जवाब में उसने चित्कार भरते हुए कहा,-लोहे के छड़ से पीठ पर लगी है । पीठ देखने पर तीन गहरी नीली रेखाएॅं दिखीं । मेरे पास तो तत्काल कोई दवा भी नहीं थी । मैंने शाम को दवा ला देने का आश्वासन दिया ! साथ ही काम छोड़ देने की सलाह भी दी । जवाब में वह व्यंग्य भरी मुस्कान बिखेरता रहा । मुझे आश्चर्य हुआ, इसलिए बोली-अरे पागल, यहॉं पैसे ज्यादा मिलते हैं क्या? मार और अपमान की परवाह करो, पैसे की छोड़ों ! आखिर सारे दिन मशीन की तरह काम करते हो । वह फिर हॅंसा ! वही भेद-भरी मुस्कान । मुझे खीज आ गई । अरे भाई, कुछ साफ-साफ बताओगे भी, मैं लगभग चीखी । अचानक उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई और उसने बड़ी ही अजीब कथा सुनाई । दीदी, वेतन मेरा कितना है, ये तो मुझे भी नहीं मालूम । आन्टी मेरे ही गॉंंव की हैं । मेरे अम्मा-बाबूजी इनके खेत में ही काम करते हैं । मेरे काम के बदले जो भी पैसे हुए सब अम्मा को ही मिलते है । साल में कभी एक या दो दिन के लिए ये लोग घर जाते हैं तो मैं भी जाता हॅंू । वर्ना यहीं रहता हॅंू । जब से यहॉं थोड़ी-सी गलती या कोई बात पसंद न होने पर खूब पीटते हैं । एक बार तो मैं भाग कर गॉंव चला गया था । दो दिन बाद ये लोग वहॉं गये और मुझे खूब मारा खूब । अम्मा भी कुछ नहीं बोलीं । उल्टा भाग कर आने के लिए मुझे ही डांटने लगीं । मैं फिर से यहॉं आ गया । मैंने कहा, ये कोई तरीका नहीं है विजय, अपनी मम्मी को बताओ यहॉं क्या होता है । जवाब में उसने बताया,-दीदी अम्मा या बाबूजी कोई हो, इन लोगों के पक्ष में ही रहते हैं । उनको लगता है, इतना बढ़िया शहरी जैसा बात करना सीख गया है । खाना भी शहरी बनाता है । उन्हें तो पता है शहर में कम काम करना पड़ता है । यहॉं आराम ज्यादा है और पैसा भी गॉंव की अपेक्षा ज्यादा । यहॉं भी मेरे हिस्से का पैसा तो उन्हें ही मिलता है । मेरी तीन छोटी-छोटी बहनें हैं । अम्मा उन लोगों की शादी शहर में करेगी, इसलिए पैसा जमा कर रही है । अब मेरी बोलती बंद थी । क्या समझाऊॅं, क्या सुझाउुॅं? उसने ही हॅंसकर कहा-यही जिंदगी है, जाने दीजिए । बड़ी होकर मेरी बहनें मेरा नाम लेंगी । फिर मुझे असमंजस में ही छोड़कर वह शाम का नाश्ता बनाने चला गया ।
इसके बाद भी मैं विजय और उसकी समस्याओं में उलझी रही । अब वो काम छोड़ने को ही तैयार नहीं तो क्या करूॅं ! और कैसे है उसके मॉं-बाप? क्या पता गॉंव की मिट्टी में रचे-बसे बड़े ही सीधे-सादे लोग हों । सहेलियों से चर्चा करने पर भी कोई अच्छा समाधान नहीं निकला । दो-तीन दिन बाद ही वार्डन की बेटी नीली ने मुझे साथ खाना खाने का निमंत्रण दिया । मैंने स्वीकार किया और उसके फलैट में चली गई । खाना खिलाते समय विजय जग से पानी डाल रहा था कि थोड़ा पानी छलक कर टेबल पर गिरा और चटाक से नीली का हाथ विजय के गाल पर पड़ा । मैं सन्न रह गई । नीली विजय की हम उम्र ही होगी । ऐसी गुस्ताखी ! पास खड़ी आन्टी ने भी विजय को ठीक से काम करने के लिए डॉंटा । मेरे मुॅंह का और गले से नीचे नहीं उतर सका । एक मानव का दूसरे मानव पर ऐसा अधिकार । महानगर में ऐसी है इक्कीसवीं सदी ।कहॉं है मानवता ? विजय आज ही हॉस्टल छोड़ेगा, सोचकर मैं क्षुब्ध मन से अपने कमरे में आ गई । शाम के नाश्ते पर मेरी उससे मुलाकात हुई । मैंने कहा-विजय, चलो तुम मेरे घर पर रहना, मेरे पापा तुम्हें बेटे जैसा प्यार देंगे । पर, वो तैयार नहीं हुआ ! एक तरफ उसे वार्डन और घरवालों का डर था दूसरी तरफ वो अपनी मॉं या बहनों से नाता तोड़ना नहीं चाहता था । बिना रिश्ता तोड़े उसका कहीं और जाना कहॉं संभव होता । कुछ दिन बाद, मैंने हॉस्टल छोड़ दिया । आज विजय पता नहीं कहॉं होगा । हॉस्टल में ही अब भी पीटता है या कहीं और है ।शायद बहनों को ब्याह हो गया हो । कौन समझेगा उसके परिवार में उसका लगाव उसका त्याग । आज भी सचमुच इंसान कहला सकने वाले विजय का बार-बार स्मरण हो ही जाता है ।

16 टिप्‍पणियां:

हिमांशु ने कहा…

लम्बी पोस्ट, पर पढ़ ही गया.
धन्यवाद.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

ह्रदयस्पर्शी पोस्ट ।

Sanjay ने कहा…

very touching

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

मर्मस्पर्शी आलेख है. काश हमारे देश में बालश्रम का खात्मा हो पाटा.

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

शैली मैंने आपकी यह दूसरी कहानी भी पढ़ी !
यह कहानी भी पुरस्कार की श्रेणी में
आ सकती है ! पहली कहानी का "एक्सटेंशन"
ही है ये विजय की कहानी !

बहुत अच्छी और दिल को छूती हुयी !
बस ऊपर वाले से इतनी ही इल्तजा कर
सकता हूँ की जहाँ भी विजय जैसे लोग हों
वहां शैली जैसे मानवीय दिल वाले लोग भी हों !

नोट :
कहानी में कम से कम २-३ पैराग्राफ दे दीजिये !

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही मार्मिक कहानी , ओर सच भी जरुर होगी , कहते है दास प्रथा खत्म हो गई, लेकिन यह सब क्या है??.
धन्यवाद

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत ही मार्मिक कहानी , ओर सच भी जरुर होगी , कहते है दास प्रथा खत्म हो गई, लेकिन यह सब क्या है??.
धन्यवाद

आशीष ने कहा…

दिल दुख गया विजय की दास्तान पढ़कर

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बहुत मार्मिक कथा लिखी है विजय की....मन भर आया...न जाने कितने ऐसे विजय ऐसे कहाँ कहाँ पिटते होंगे...लेकिन उनकी कथा लिखने वाले कितने हैं...सोचनीय विषय...
नीरज

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बेचारा विजय तो देश के हर कोने में रोज़ अपनी मासूमियत को पिटते देखता है।

पुरुषोत्तम कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी पोस्ट.

Science Bloggers Association of India ने कहा…

बहुत ही मर्मस्पर्शी कहानी है, बधाई।

sandhyagupta ने कहा…

Jaane kitne hi Vijay hamare ird-gird bhi ghum rahen hain parantu kya hamne kabhi unke baare me socha hai ?

लाल और बवाल (जुगलबन्दी) ने कहा…

प्रिय शैली, आपने प्यारे से बच्चे विजय की बड़ी ही मार्मिक कथा लिखी है और वो भी बड़ी ही मेहनत से। आप ऐसे ही लेखन को जारी रखिए। आपको बहुत बहुत शुभाशीर्वाद और बधाई।

SANJEEV MISHRA ने कहा…

kahaani sundar evam hridaysparshi hone ke saath hi apke vyaktitwa ke samvedansheel evam bhavnaamtmak star ko bhi bhali prakar vyakt kartii hai. kyoni bina samvedansheel hue mujhe nahin lagta ki kisi bhi hridaysparshi kahani ya kavita ka chitta men avtaran sambhav hai. der se aane ke liye pradan karen evam rachna par badhaayee sweekaar karen.

परा वाणी - the ultimate voice ने कहा…

चिंतन प्रबल एवं सृजन मूलक है ..शुभकामनाएं